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अलीगढ़ में बनेगी राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय|Aligarh main Banega Raja Mahindra Pratap Singh University in Hindi

हमारे इतिहास की किताबें भारत की स्वतंत्रता में योगदान देने वाले कई लोगों की बारे में जानकारी नहीं देता है या फिर उन स्वतंत्रता सेनानियों को हमारे द्वारा भुला दिया जाता है । ऐसे में ही एक स्वतंत्रता सेनानी हैं, राजा महेंद्र प्रताप सिंह। हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया गया। राजा महेंद्र प्रताप सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, लेखक, पत्रकार और पूर्व भारतीय सांसद थे। 2019 में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर विश्वविद्यालय निर्माण की बात कही थी ।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह कौन थे :-

इनका जन्म 1886 में हाथरस के मुरशन स्टेट में शाही जाट परिवार में हुआ । इनके पिता का नाम घनश्याम सिंह था। यह अपने पिता के तीसरे पुत्र थे। महेंद्र प्रताप सिंह को राजा हर नारायण सिंह ने निसंतान होने के कारण गोद ले लिया। उनकी प्राथमिक शिक्षा STS स्कूल तथा उच्च स्तरीय शिक्षा एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज ( बाद में Aligarh Muslim university) अलीगढ़ से हासिल की। इनका विवाह 1902 में बलवीर कौर से हुई । इनके विवाह के बारात के लिए हाथरस से संगुर के लिए दो विशेष ट्रेन चलाई गई ।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह द्वारा किया गया कार्य :-

  • राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अलीगढ़ शिक्षण संस्थान के विकास हेतु अपनी जमीन दान में दिया था और अलीगढ़ सिटी स्कूल की जो जमीन है वो राजा महेंद्र प्रताप सिंह के परिवार के द्वारा लीज पर दिया गया था।
  • इन्होंने साल 1909 में मथुरा में प्रेम महाविद्यालय नाम का एक तकनीक स्कूल की स्थापना की थी । ऐसा कहा जाता है यह भारत का पहला पॉलिटेक्निक स्कूल था।
  • स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान इन्होंने अपनी पढ़ाई को छोड़कर स्वतंत्रता के अभियान में कूद पड़े 1906 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए । वहां से स्वदेशी आंदोलन के प्रबल समर्थक बने।
  • राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान 1 दिसंबर 1915 को काबुल के बाग ए बाबर में भारत के बाहर, भारत की पहली अस्थाई सरकार की घोषणा की थी । उन्होंने खुद को राष्ट्रपति और अपने सहयोगी बरकतउल्ला को अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री बनाया।
  • स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लड़ रहे क्रांतिकारियों के समर्थन हेतु विभिन्न देशों के यात्रा की। उन्होंने जर्मनी ,जापान ,रूस आदि देशों के राजनीतिक नेताओं से भारत के आजादी के लिए सहायता की मांग की। ऐसा कहा जाता है की इनका रूस के लेनिन से अच्छा संबंध था। इन के बढ़ते प्रभाव और कार्यों को देख कर अंग्रेज ने उन पर इनाम घोषित कर दिया और इन्हें भगोड़ा साबित कर उनको पकड़ने की कोशिश करने लगा। इसी को देखते हुए 1925 में जापान भाग गए और बाहर से भारत के आजादी को लेकर लगातार संघर्ष करते रहे।
  • 1929 में जापान में वर्ल्ड फेडरेशन मासिक मैगजीन को प्रकाशित किया। यह विश्व युद्ध की परिस्थितियों का लाभ उठाकर ब्रिटिश को खदेड़ना चाहते थे।
    द्वितीय विश्व युद्ध के समय यह जापान में थे और उस समय भी ब्रिटिश सरकार के विरोध में काम करते रहें।
  • 32 वर्ष तक भारत से बाहर रहने के बाद उनसे 1946 में भारत वापस आए महेंद्र प्रताप सिंह भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संघ और ऑल इंडिया जाट महासभा के अध्यक्ष भी रह चुके।

अन्य बातें :-

  • इनकी आत्मकथा का नाम माय लाइफ स्टोरी है।
  • उन्होंने विश्व शांति हेतु विश्व संघ की शुरुआत की थी । इसके जरिए उन्होंने भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना को साकार रूप देने का प्रयास किया।
  • ऐसा माना जाता है कि यूएनओ की स्थापना के पीछे विश्व संघ का भी योगदान रहा ।
  • 1932 में डॉ एन सी नेल्सन (अंतरराष्ट्रीय शांति ब्यूरो आयोग के सदस्य ) द्वारा नोबेल शांति पुरस्कार के लिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह को नामित किया गया था।
  • इन के सम्मान में भारत सरकार ने पोस्टेज स्टैंप की शुरुआत भी की थी और इन्हें आर्यन पेशवा के नाम से भी जाना जाता है।
  • राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने 1957 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मथुरा लोकसभा सीट से कांग्रेस के दिगंबर चौधरी तथा जनसंघ पार्टी के अटल बिहारी वाजपेई को हराकर जीत दर्ज की।
  • महेंद्र प्रताप सिंह पंचायती राज व्यवस्था के प्रबल समर्थक थे।

महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय :-

इस विश्वविद्यालय की स्थापना अलीगढ़ के कॉल तहसील के लोढा और मूसेपुर क्षेत्र में 92 एकड़ के क्षेत्रफल पर होगा ।इसकी कुल लागत 101 करोड़ होने की संभावना है। इस विश्वविद्यालय से अलीगढ़, कासगंज, हाथरस और एटा के 395 कॉलेजों को जोड़ा जाएगा। हमारे देश में कई स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का सम्मान नहीं किया जाता है। विदेशी क्रूर आक्रमणकारी के नाम पर हमारे देश में कई स्थान, स्मारक, इमारत , सडक आदि हैं। परंतु हमारे स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर नहीं के बराबर है।
स्वतंत्रता सेनानी के सम्मान में उठाया गया । यह कदम बहुत ही सराहनीय है। इसी तरह अन्य स्वतंत्रता सेनानी के सम्मान में कदम उठाकर विकास कार्यों को उन से जोड़ा जाना चाहिए।

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